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भूमि अधिकार पर राष्ट्रीय विमर्श में जुटे देश भर के 80 से ज्यादा कार्यकर्ता

Date : 14-April-2019

भूमि सुधार है कृषि संकट से उबरने का रास्ता

भोपाल, 14 अप्रैल 2019। “जहां तक भूमि के मुद्दे का सवाल है, तो प्राकृतिक संसाधनों के मुद्दे गौर किए बिना और कृषि को केंद्र में रखे बिना भूमि के मुद्दे पर बात करना बेतुका है। देश की उन आर्थिक नीतियों पर भी गौर करने और सुधार लाने की जरूरत है, जिसके कारण कृषि हतोत्साहित हो रही है।” भूमि अधिकार पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय विमर्श में ये बातें जेएनयू के प्रोफेसर प्रवीण झा ने आज भोपाल में कही।

सामाजिक संस्था जन पहल और एक्शनएड एसोसिएशन के साझा प्रयास से आयोजित भूमि अधिकार पर राष्ट्रीय विमर्श वभिन्न सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों और जमीन के मुद्दे पर काम कर रहे सामाजिक कार्यकर्ताओं की बैठक के साथ शुरु हुआ। इस दो दिवसीय विमर्श का उद्देश्य भूमिहीन समुदायों के भूमि अधिकार के संघर्ष को मजबूत करने के लिए रणनीतियां तैयार करना है।

विकसित देश जहां व्यापक तौर पर कृषि संरक्षण की रणनीति अपना रहे हैं, वही इसके ठीक उलट विकासशील देशों में कृषि पर हमले की नीतियां देखने को मिल रही हैं, जिससे कृषि और कृषक दोनों ही संकट में हैं। अगर स्थिति ऐसी ही रही तो जल्द ही विकसित देश कृषि के क्षेत्र में विकासशील देशों पर हावी होंगे। यह चिंता का विषय है और प्राकृतिक संसाधनों के मुद्दे गौर करते हुए भूमि के मुद्दे पर बात करने और भूमि सुधार के एजेंडे को सभी राजनीतिक और नागरिक चर्चाओं के केंद्र में लाने और भूमि सुधारों को प्रतिबद्धता के साथ प्रभावी ढंग से लागू किए जाने की जरूरत है। ग्रामीण क्षेत्रों में सार्वजनिक और सामुदायिक भूमि के सवाल पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है, क्योंकि इन जगहों पर पिछड़े और वंचित समुदायों की पहुंच न होने की वजह से मत्स्यपालन, पशुपालन आदि पेशे आज संकट की स्थिति में हैं और कहीं न कहीं इस वजह से कृषि संकट का एक कारण भूमि अधिकारों का अनसुलझा मुद्दा भी है।

कार्यक्रम में मौजूद एकता परिषद के रमेश शर्मा ने कहा, “पिछले कुछ सालों में भूमि वितरण का क्रियान्वयन बेहद धीमा रहा है। लगभग 90 प्रतिशत भूमि अधिग्रहण परियोजनाएं, वन अधिकार अधिनियम जैसे जनहित कानून की राह का रोड़ा बने हैं। भारत में भूमि अधिकार का सवाल सांप-सीढ़ी के खेल जैसा है, जो भूमिहीन समुदायों के खिलाफ है। बीते 5 सालों में लगभग 8.5 लाख हेक्टेयर भूमि ढांचागत परियोजनाओं के भेंट चढ़ गई। वन परियोजनाओं में 70,000 हेक्टेयर और 2.9 लाख हेक्टेयर शहरी विकास की परियोजनाओं के हिस्से में गई और आज स्थिति यह है कि ग्रामीण क्षेत्रों के समुदाय और लोग भूमि अधिकार से वंचित हैं।”

शोधकर्ता रोहिणी चतुर्वेदी ने कहा, “जलवायु परिवर्तन के समाधान और रोकथाम से संबंधित मुद्दों पर हमें संरक्षण और अधिकार की वकालत करने वाले समूहों और कार्यकर्ताओं के बीच मतभेद पैदा करने वाली षड़यंत्रकारी नीतियों से बचाव का रास्ता ढूंढने की जरूरत है।”

शोधकर्ता यमुना सन्नी ने केरल में भूमि सुधार का उदाहरण रखते हुए बताया, “केरल में खेतिहर मजदूरों की कमरतोड़ श्रम की वजह से ही कृषि संभव हो पाई। लंबे संघष के बाद हालांकि भूमि सुधार के माध्यम से आसामी खेतिहरों के भूमि अधिकार तो सुनिश्चित हुए, लेकिन भूमिहीन खेतिहर श्रमिकों को फायदा नहीं हुआ।”

दो दिवसीय विमर्श कार्यक्रम में राजकुमार सिन्हा, सुरेश जॉर्ज, निकोलस बारला, शंकर तड़वाल, घनश्याम, अशोक चौधरी, देवजीत नंदी, लिंडा चकचुआक, देबाशीष समल, कपिलेश्वर, संदीप चाचरा, प्रफुल्ल सामंतरा, बालकृष्ण रेनके सहित कार्यक्रम में शामिल होने आए प्रतिभागियों ने दलित, आदिवासी और महिलाओं के भूमि अधिकारों, विस्थापन की त्रासदी और भूमि सुधार से सबंधित मुद्दों पर चर्चा की।

भूमि अधिकार के मुद्दे पर दो दिवसीय राष्ट्रीय विमर्श निम्नलिखित मुद्दो पर केंद्रित होगाः

  • भूमिहीनों के भूमि अधिकार को सुनिश्चित करने के लिए भूमि सुधार को राष्ट्र और राज्यों के एजेंडे पर लाने की आवश्यकता है।
  • आदिवासी और वनभूमि पर बसे अन्य समुदायों के सामुदायिक अधिकारों को सुनिश्चित करने और सभी के लिए भूमि संरक्षण और संवर्धन को बढ़ावा देने के लिए वन अधिकार कानून के प्रभावी क्रियान्वयन की आवश्यकता है।
  • महिलाओं के भूमि अधिकारों के संरक्षण और प्रोत्साहन की आवश्यकता है।
  • दलित और आदिवासियों को राज्य सरकारों द्वारा वितरित और आवंटित भूमि के मुद्दे का जायजा लेने की आवश्यकता है।
  • राष्ट्रीय भूमि अधिकार अभियान के लिए एक रणनीति तैयार करने की आवश्यकता है।
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